त्रेतायुग में माता वैष्णो देवी त्रिकुटा पर्वत की ओर जा रही थीं। पीछे से भैरव नाथ उनका पीछा कर रहा था। माता तेज कदमों से जंगल पार करती रहीं।
माता ने पीछे मुड़कर देखा। उनके दिव्य चरणों के निशान पत्थर पर अंकित हो गए। यह पवित्र स्थान चरण पादुका कहलाया — कटरा से 2.5 किमी।
माता के भक्त हनुमान जी प्यास से व्याकुल थे। माता ने अपने दिव्य धनुष से बाण चलाया और पत्थर से पवित्र जल प्रकट हुआ। यही स्थान बाणगंगा कहलाया।
बाणगंगा के पवित्र जल में माता ने अपने दिव्य केश धोए। इस स्थान को केश घाट भी कहा जाता है। माता के स्पर्श से यह जल और भी पवित्र हो गया।
माता ने त्रिकुटा पर्वत की एक संकरी गुफा में शरण ली जिसे गर्भ जून कहते हैं। यहाँ माता ने 9 महीने निरंतर ध्यान किया। यात्रा का यह मध्य बिंदु है — कटरा से 6 किमी।
माता त्रिकुटा पर्वत (5,200 फीट) पर स्थित पवित्र गुफा में पहुंचीं। यहाँ तीन पिंडियाँ हैं — महाकाली (लाल), महासरस्वती (श्वेत) और महालक्ष्मी (पीली)।
भैरव नाथ ने माता तक पहुंचने की कोशिश की। हनुमान जी ने उसका रास्ता रोका। दोनों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। हनुमान जी ने भैरव को पीछे धकेल दिया।
भैरव नाथ ने बाधा डालना जारी रखा। माता ने महाकाली का विराट रूप धारण किया। उनकी शक्ति से सारी पृथ्वी काँप उठी। भैरव नाथ को अपनी गलती का एहसास हो गया।
माता ने अपने खड्ग से भैरव नाथ का सिर काट दिया। उसका सिर उड़कर 2.5 किमी दूर एक पहाड़ी पर जा गिरा। उसी क्षण भैरव को माता की दिव्यता का बोध हुआ।
भैरव नाथ ने पश्चाताप किया। माता ने उन्हें वरदान दिया — "जो भक्त मेरे दर्शन के बाद भैरव नाथ के दर्शन नहीं करेगा, उसकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी।" भैरव नाथ को द्वारपाल बनाया गया।
भवन में तीन पिंडियाँ हैं — महाकाली (लाल), महासरस्वती (श्वेत) और महालक्ष्मी (पीली)। ये प्राकृतिक रूप से बनी हैं। इनके दर्शन से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं। जय माता वैष्णो देवी!
यह थी माता वैष्णो देवी की संपूर्ण कथा — रियल मूवमेंट के साथ। अब यात्रा की तैयारी करें और माता के दर्शन प्राप्त करें।
माता वैष्णो देवी को त्रिदेवियों — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — का सम्मिलित रूप माना जाता है। वे सतयुग में पृथ्वी पर जन्मी थीं। उनका उद्देश्य था — भक्तों को दर्शन देना और त्रिकुटा पर्वत पर विराजना।
माता के भक्त हनुमान जी प्यासे थे। माता ने दिव्य बाण चलाया और पत्थर से पवित्र जल प्रकट हुआ। यही स्थान बाणगंगा कहलाया। माता ने यहाँ अपने केश भी धोए।
भैरव से बचते हुए माता ने एक संकरी गुफा में शरण ली। इस गुफा को गर्भ जून कहते हैं। माता ने यहाँ 9 महीने तक ध्यान किया। अर्धकुंवारी की गुफा मात्र 1.5 फीट चौड़ी और 15 मीटर लंबी है।
जब भैरव ने लगातार पीछा किया, माता ने महाकाली रूप धारण किया और भैरव का सिर काट दिया। सिर 2.5 किमी दूर जा गिरा। माता ने उन्हें वरदान दिया — भैरव के दर्शन के बिना यात्रा अधूरी है।
भवन में तीन पिंडियाँ हैं — महाकाली (लाल), महासरस्वती (श्वेत) और महालक्ष्मी (पीत)। ये प्राकृतिक रूप से बनी हैं और जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट करती हैं। जय माता वैष्णो देवी!