वह तांत्रिक जो माता का पीछा करते-करते उनका शाश्वत द्वारपाल बन गया — संपूर्ण कथा
भैरव नाथ एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक थे। तंत्र विद्या में उनकी दक्षता असाधारण थी। उन्होंने वर्षों तक कठोर तांत्रिक साधनाएं की थीं और अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। परंतु उनकी तांत्रिक शक्ति उनके अहंकार का कारण बन गई।
भैरव नाथ का मानना था कि यदि वे किसी उच्च आत्मा या दिव्य शक्ति को अपने वश में कर लें, तो उनकी शक्ति अजेय हो जाएगी। इसी लालसा में जब उन्होंने पं. श्रीधर के भंडारे में वैष्णवी (माता वैष्णो देवी) को देखा, तो उन्होंने उन्हें एक असाधारण शक्ति समझकर पकड़ने का प्रयास किया।
पं. श्रीधर ने नवरात्रि पर एक भव्य भंडारे का आयोजन किया था। इस भंडारे में क्षेत्र के सभी लोगों को आमंत्रित किया गया था। भैरव नाथ भी इस भंडारे में पहुँचे।
भोजन परोसते समय भैरव नाथ की दृष्टि एक दिव्य कन्या पर पड़ी जो अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से सभी को खाना परोस रही थी। भैरव नाथ ने अपनी तांत्रिक दृष्टि से देखा कि यह कोई साधारण कन्या नहीं — इसके चारों ओर एक दिव्य ऊर्जा का आभामंडल था।
भैरव नाथ के मन में लालसा जागी — यदि वे इस शक्ति को वश में कर लें तो वे त्रिलोक के सबसे शक्तिशाली तांत्रिक बन जाएंगे। उन्होंने उस कन्या को पकड़ने का प्रयास किया।
जब भैरव नाथ ने माता का पीछा आरंभ किया, तो माता ने अपने वाहन लंगूर वीर के साथ उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया — त्रिकुटा पर्वत की ओर। यह पलायन कोई कायरता नहीं थी — माता को एक निश्चित समय और स्थान पर अपनी लीला पूर्ण करनी थी।
मार्ग में तीन महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं:
माता अर्धकुंवारी की संकरी गुफा में 9 महीने रहीं। इस दौरान उन्होंने गहरी तपस्या और ध्यान किया। भैरव नाथ गुफा के बाहर डेरा डाले बैठा रहा।
9 महीने बाद माता ने उस गुफा की पिछली दीवार तोड़ी और बाहर निकलीं। यही कारण है कि अर्धकुंवारी में दो प्रवेश और निकास द्वार हैं — एक पुराना और एक नया जो माता ने स्वयं बनाया। माता का इस गुफा से नया जन्म हुआ माना जाता है।
अर्धकुंवारी से निकलने के बाद भी भैरव नाथ ने माता का पीछा जारी रखा। माता भवन की ओर बढ़ती रहीं। रास्ते में लंगूर वीर ने भैरव नाथ को रोकने का प्रयास किया, परंतु भैरव नाथ बहुत शक्तिशाली था।
कुछ कथाओं में उल्लेख है कि माता के एक अन्य अनुयायी पं. श्रीधर भी रास्ते में आए और उन्होंने भैरव नाथ को रोकने का प्रयास किया, परंतु व्यर्थ। भैरव नाथ का अहंकार अपने चरम पर था।
जब भैरव नाथ भवन तक पहुँच गया, तो माता ने समझ लिया कि अब लीला का समय आ गया है। उन्होंने अपना महाकाली स्वरूप धारण किया — एक विकराल, तेजस्वी, भयंकर रूप। उनके दस हाथ थे, जिनमें अस्त्र-शस्त्र थे। उनकी आँखें आग उगल रही थीं। उनकी जिह्वा बाहर निकली हुई थी।
इस भीषण रूप को देखकर भी भैरव नाथ नहीं रुका। माता ने उसके साथ भीषण युद्ध किया। यह युद्ध पर्वत की चोटी पर हुआ जहाँ आज भवन स्थित है।
अंत में माता ने अपनी खड्ग (तलवार) से भैरव नाथ का सिर काट दिया। उसका सिर उड़कर लगभग 2 किलोमीटर दूर एक स्थान पर जा गिरा। यह स्थान आज भैरव घाटी (भैरव मंदिर) के नाम से जाना जाता है।
"माता का महाकाली स्वरूप उस पल प्रकट हुआ जब अधर्म को अपनी सीमा पार करनी थी। यह युद्ध केवल भैरव नाथ से नहीं था — यह अहंकार, लालसा और अधर्म के विरुद्ध था।"
सिर कटने के बाद भी भैरव नाथ का चेतन अंश जीवित था। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने माता से क्षमा माँगी:
"माँ, मैंने जो किया वह पाप था। मैं अपने अहंकार और लालसा में अंधा हो गया था। कृपया मुझे क्षमा करें।"
माता ने उसकी प्रार्थना सुनी। माता का हृदय दयालु है — वे दंड देती हैं परंतु अंत में क्षमा भी करती हैं। माता ने भैरव नाथ को मोक्ष प्रदान किया और कहा:
"भैरव नाथ, तुम्हें क्षमा किया। परंतु तुम्हें एक दायित्व भी सौंपा जाता है — जो भी भक्त मेरे दर्शन करे, उसे तुम्हारे भी दर्शन करने होंगे। तभी उनकी यात्रा पूर्ण मानी जाएगी। तुम सदा मेरे भक्तों के रक्षक रहोगे।"
भैरव नाथ का सिर जहाँ गिरा, वहाँ आज भैरव मंदिर स्थित है। यह मंदिर भवन से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए भवन से खड़ी चढ़ाई है।
भैरव मंदिर की विशेषताएं:
भैरव नाथ की यह कथा केवल एक पौराणिक कहानी नहीं — यह जीवन के गहरे सत्य को उजागर करती है:
कुछ धार्मिक ग्रंथों में भैरव नाथ को भगवान शिव का एक रूद्र अवतार माना गया है। यह विचार रोचक है — माता शिव की आराधिका हैं, और शिव के एक रूप ने ही उनकी परीक्षा ली। इस दृष्टिकोण से, भैरव नाथ का पीछा करना माता की लीला का एक भाग था — ताकि वे त्रिकुटा पर्वत पर पहुँचें और विश्व कल्याण के लिए वहाँ विराजमान हों।
कुछ विद्वान मानते हैं कि यदि भैरव नाथ माता का पीछा न करता, तो माता त्रिकुटा पर्वत पर न पहुँचतीं। इस अर्थ में, भैरव नाथ — अजाने में — माता की लीला का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया।
"जय भैरव नाथ! माता के धाम का प्रहरी, जिसने अपनी गलती से पश्चाताप कर मोक्ष पाया और अब सदा माता के भक्तों की रक्षा करता है।"