त्रेतायुग में भगवान श्री राम और वैष्णवी की दिव्य भेंट, वरदान और कलियुग में माता के धाम की स्थापना की संपूर्ण कथा
सनातन धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि जब असुरों का अत्याचार बढ़ने लगा और धरती पर धर्म का ह्रास होने लगा, तब आदिशक्ति ने अलग-अलग युगों में विभिन्न रूप धारण कर संसार की रक्षा की। त्रेतायुग में यही आदिशक्ति दक्षिण भारत में रत्नाकर सागर के तट पर पंडित रत्नाकर और माता समृद्धि की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। इस कन्या का नाम वैष्णवी रखा गया, क्योंकि वे जन्म से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थीं और विष्णु-तत्व की साक्षात प्रतिमूर्ति मानी जाती थीं।
वैष्णवी का बचपन असाधारण चमत्कारों से भरा था। मात्र कुछ वर्ष की आयु में ही उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ कर दी थी। वे जंगलों में एकांत में बैठकर घंटों ध्यान करतीं और भगवान विष्णु के नाम का जाप करती रहतीं। गाँव के लोग उन्हें देवी स्वरूप मानने लगे थे।
त्रेतायुग में जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तब भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ माता सीता की खोज में दक्षिण भारत की ओर बढ़े। इसी यात्रा के दौरान, वानर सेना के संगठन और सुग्रीव से मित्रता से पहले, श्री राम का मार्ग रत्नाकर सागर के उस तट से होकर गुजरा जहाँ युवती वैष्णवी तपस्या में लीन थीं।
श्री राम, जो स्वयं परमात्मा के अवतार थे, वैष्णवी की दिव्य आभा और तेज को तुरंत पहचान गए। उन्होंने समझ लिया कि यह कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि साक्षात आदिशक्ति हैं जो मानव रूप में अवतरित हुई हैं।
वैष्णवी ने श्री राम के तेज और सौंदर्य को देखकर उनसे विवाह करने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने श्री राम से प्रार्थना की कि वे उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करें। यह प्रसंग वैष्णो देवी कथा का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक भाग माना जाता है।
"हे वैष्णवी! इस अवतार में मैं एकपत्नीव्रती हूँ। माता सीता मेरी अर्धांगिनी हैं और मैं उनके प्रति वचनबद्ध हूँ। परंतु तुम्हारी भक्ति, तप और समर्पण देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें कलियुग में एक ऐसा वरदान देता हूँ जो युगों-युगों तक तुम्हें अमर बना देगा।"
श्री राम ने अत्यंत करुणा और सम्मान के साथ वैष्णवी को समझाया कि उनका उद्देश्य विवाह नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए एक अलग भूमिका निभाना है। उन्होंने कहा कि वैष्णवी को स्वयं की एक अलग पहचान और शक्ति के साथ धरती पर प्रतिष्ठित होना है।
भगवान श्री राम ने वैष्णवी को एक असाधारण वरदान दिया, जो आज भी माता वैष्णो देवी की कथा का केंद्र बिंदु है:
यह वरदान सुनकर वैष्णवी अत्यंत हर्षित हुईं और श्री राम को प्रणाम कर उत्तर दिशा की ओर, त्रिकुटा पर्वत की ओर अपनी दिव्य यात्रा पर निकल पड़ीं।
श्री राम के वरदान के पश्चात वैष्णवी ने अपनी उत्तर दिशा की यात्रा आरंभ की। इस यात्रा में उनके साथ लंगूर वीर (जिन्हें हनुमान जी का ही एक स्वरूप माना जाता है) रक्षक के रूप में चलते रहे। मार्ग में वैष्णवी ने अनेक स्थानों पर विश्राम किया और अनेक दिव्य लीलाएं कीं, जो आज भी यात्रा मार्ग के पवित्र स्थलों के रूप में विद्यमान हैं:
अंततः वैष्णवी त्रिकुटा पर्वत की पवित्र गुफा में पहुँचीं और वहाँ तीन पिंडियों — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — के रूप में सदा के लिए विराजमान हो गईं, ठीक वैसे ही जैसा श्री राम ने वरदान में कहा था।
आज, हजारों वर्षों बाद भी, श्री राम का वह वरदान पूर्णतः सत्य सिद्ध हो चुका है। हर वर्ष एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु त्रिकुटा पर्वत पर माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आते हैं। यह विश्व की सबसे अधिक देखी जाने वाली शक्तिपीठों में से एक है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि माता के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता — यह श्री राम के दिए गए वरदान की ही निरंतरता है।
यह भी माना जाता है कि श्री राम भक्त हनुमान जी का सूक्ष्म रूप आज भी वैष्णो देवी भवन के मार्ग की रक्षा करता है, विशेषकर लंगूर टापू के रूप में, जहाँ यात्री विशेष पूजा करते हैं।
यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक शिक्षा भी देती है:
चूंकि श्री राम और वैष्णवी का यह प्रसंग नवरात्रि काल से जुड़ा माना जाता है, इसलिए चैत्र नवरात्रि और राम नवमी के अवसर पर वैष्णो देवी भवन में विशेष पूजा और आरती का आयोजन होता है। भक्त इस दिन श्री राम और माता वैष्णो देवी दोनों की एक साथ आराधना करते हैं, जो इस दिव्य संबंध का प्रतीक है।
श्री राम और माता वैष्णो देवी की यह कथा सनातन धर्म के सबसे प्रेरणादायक प्रसंगों में से एक है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती, और धैर्य तथा समर्पण से हर मनोकामना पूर्ण होती है। आज भी जब कोई भक्त "जय माता दी" और "जय श्री राम" का उद्घोष करता है, तो वह इसी शाश्वत, पवित्र संबंध को नमन करता है।
श्री राम ने वैष्णवी को त्रिकुटा पर्वत पर शाश्वत धाम स्थापित करने और कलियुग में सर्वाधिक पूजे जाने का वरदान दिया।
हाँ, त्रेतायुग की वैष्णवी ही आज माता वैष्णो देवी के रूप में त्रिकुटा पर्वत, कटरा में पूजी जाती हैं।
लंगूर वीर (हनुमान जी का स्वरूप) श्री राम के आशीर्वाद से वैष्णवी की यात्रा में रक्षक बने और आज भी भक्तों की रक्षा करते हैं।